मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी की मनमानी,9 माह तक निलंबित रहे तृतीय श्रेणी लिपिक संदीप भाटी को दिया प्रशस्ति पत्र

मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी की मनमानी: निलंबन झेल चुके तृतीय श्रेणी लिपिक को 26 जनवरी 2026 को प्रशस्ति पत्र
📌 मामला क्या है?
नरसिंहपुर जिला मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी कार्यालय से जुड़ा एक मामला इन दिनों चर्चा में है, जिसने प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
तृतीय श्रेणी लिपिक संदीप भाटी, जिनके विरुद्ध पूर्व में भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते निलंबन की कार्यवाही की गई थी और जो लगभग 9 माह तक निलंबित रहे, उन्हें 26 जनवरी 2026 को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया।
तृतीय श्रेणी लिपिक संदीप भाटी, जिनके विरुद्ध पूर्व में भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते निलंबन की कार्यवाही की गई थी और जो लगभग 9 माह तक निलंबित रहे, उन्हें 26 जनवरी 2026 को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया।
📞 3 नवंबर 2025 की फोन बातचीत
इस पूरे प्रकरण को और गंभीर बनाता है वह तथ्य, जब 3 नवंबर 2025 को स्वयं मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. मनीष मिश्रा ने शिकायतकर्ता विनय श्रीवास्तव से फोन पर बातचीत की थी।
शिकायतकर्ता के अनुसार, इस बातचीत में CMHO ने स्पष्ट रूप से कहा था कि:
शिकायतकर्ता के अनुसार, इस बातचीत में CMHO ने स्पष्ट रूप से कहा था कि:
- संदीप भाटी को उसी कार्यालय में बनाए रखना उचित नहीं है।
- निलंबन से बहाली के बाद उन्हें अन्यत्र पदस्थ किया जाना चाहिए।
- इस संबंध में आवश्यक प्रशासनिक निर्देश दिए जा रहे हैं।
⚠️ फिर प्रशस्ति पत्र क्यों?
जब एक ओर CMHO स्वयं यह स्वीकार कर चुके थे कि उक्त कर्मचारी को कार्यालय से अलग किया जाना चाहिए, तो इसके विपरीत 26 जनवरी 2026 को उसी कर्मचारी को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया जाना कई सवाल खड़े करता है।
प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा का विषय है कि:
प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा का विषय है कि:
- क्या यह निर्णय पूरी जानकारी के बावजूद लिया गया?
- क्या यह कदम शिकायतकर्ता की शिकायतों की अनदेखी नहीं दर्शाता?
- क्या यह प्रशासनिक विवेक और नैतिकता के अनुरूप है?
🔍 निलंबन और बहाली की पृष्ठभूमि
सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, संदीप भाटी को कलेक्टर नरसिंहपुर के आदेश दिनांक 06-06-2024 के तहत निलंबन से बहाल किया गया था।
हालाँकि, शिकायतकर्ता का कहना है कि निलंबन के बाद सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के अनुसार ऐसे कर्मचारियों को प्रायः अन्य कार्यालयों में पदस्थ किया जाता है, ताकि पूर्व विवादित परिस्थितियों की पुनरावृत्ति न हो।
इसके बावजूद भाटी को उसी कार्यालय में प्रभावी भूमिका में बनाए रखना और बाद में प्रशस्ति पत्र देना, प्रशासनिक निर्णयों पर सवाल उठाता है।
हालाँकि, शिकायतकर्ता का कहना है कि निलंबन के बाद सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के अनुसार ऐसे कर्मचारियों को प्रायः अन्य कार्यालयों में पदस्थ किया जाता है, ताकि पूर्व विवादित परिस्थितियों की पुनरावृत्ति न हो।
इसके बावजूद भाटी को उसी कार्यालय में प्रभावी भूमिका में बनाए रखना और बाद में प्रशस्ति पत्र देना, प्रशासनिक निर्णयों पर सवाल उठाता है।
📝 प्रशस्ति पत्र बना विवाद का केंद्र
26 जनवरी 2026 को जारी प्रशस्ति पत्र अब विवाद का केंद्र बन गया है। आलोचकों का कहना है कि:
- प्रशस्ति पत्र देने से पहले कर्मचारी के पूर्व रिकॉर्ड पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया।
- यह निर्णय विभागीय पारदर्शिता के सिद्धांतों के विपरीत प्रतीत होता है।
- इससे कार्यालय में यह संदेश जाता है कि शिकायतों और निलंबन का कोई वास्तविक महत्व नहीं है।
❗ उठते गंभीर सवाल
इस पूरे प्रकरण से कई अहम सवाल सामने आते हैं:
- क्या प्रशस्ति पत्र देने की प्रक्रिया में सभी तथ्यों पर विचार किया गया?
- क्या 3 नवंबर की फोन बातचीत के बाद लिए गए निर्णयों का कोई लिखित रिकॉर्ड मौजूद है?
- क्या इस मामले की स्वतंत्र या उच्चस्तरीय जांच की आवश्यकता नहीं है?
📌 निष्कर्ष
निलंबन झेल चुके एक तृतीय श्रेणी कर्मचारी को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया जाना, वह भी तब जब स्वयं मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी ने उसे कार्यालय से हटाने की बात कही हो, प्रशासनिक निर्णय प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
यह मामला केवल एक कर्मचारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि शिकायतों, जवाबदेही और पारदर्शिता को किस प्रकार लिया जा रहा है।
अब आवश्यकता है कि संबंधित उच्च अधिकारी इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष समीक्षा करें, ताकि प्रशासन में जनता का विश्वास बना रहे।
यह मामला केवल एक कर्मचारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि शिकायतों, जवाबदेही और पारदर्शिता को किस प्रकार लिया जा रहा है।
अब आवश्यकता है कि संबंधित उच्च अधिकारी इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष समीक्षा करें, ताकि प्रशासन में जनता का विश्वास बना रहे।

