28/04/2026

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निवारी पंचायत में बड़ा सवाल, 30 फीट दूरी पर दो मरघट में दो मरघट बाउंड्री वॉल और ₹6 लाख खर्च पर सवाल

🔥 30 फीट की दूरी पर दो मरघट बाउंड्री वॉल? निवारी पंचायत में ₹6 लाख खर्च पर बड़ा सवाल

📍 जिला नरसिंहपुर, तहसील करेली की ग्राम पंचायत निवारी (निवारी पान) इस समय एक बड़े निर्माण विवाद के केंद्र में है।

मरघट (शांतिधाम) की बाउंड्री वॉल निर्माण को लेकर सामने आए रिकॉर्ड, जियो-टैग और जमीन की वास्तविक स्थिति ने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

⚠️ शुरुआती जांच में दावा सामने आया है कि दो अलग-अलग मरघट निर्माण स्थलों की दूरी मात्र लगभग 30 फीट (8–9 मीटर) पाई गई है।

💸 ₹10.91 लाख की स्वीकृति, लेकिन जमीन पर सवाल

सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार निवारी मरघट के लिए 155 मीटर और नानोरी मरघट के लिए 148 मीटर बाउंड्री वॉल स्वीकृत की गई है।

दोनों कार्यों की कुल राशि लगभग ₹10.91 लाख बताई गई है, जबकि अब तक ₹6 लाख से अधिक खर्च दर्ज होने की जानकारी सामने आई है।

🔥 सबसे बड़ा सवाल यही है — अगर लाखों रुपये खर्च हो चुके हैं, तो निर्माण जमीन पर स्पष्ट क्यों नहीं दिख रहा?

📍 जियो-टैग डेटा ने खोला बड़ा राज?

जियो-टैग लोकेशन डेटा के अनुसार दोनों मरघट एक-दूसरे के बेहद पास स्थित पाए गए हैं।

इससे यह संदेह गहराता है कि क्या वास्तव में दो अलग-अलग निर्माण कार्य हुए, या एक ही स्थान को दो अलग-अलग प्रोजेक्ट के रूप में दर्ज किया गया।

ग्रामीणों का दावा है कि कागज और जमीन की हकीकत में बड़ा अंतर है।

🧑‍⚖️ पंचायत सिस्टम पर सवालों की बौछार

इस पूरे मामले में ग्राम पंचायत निवारी की सरपंच रंजना दीक्षित, सचिव नीलू पटेल और सरपंच पति महेश दीक्षित की भूमिका चर्चा में है।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि पंचायत कार्यों के संचालन में पारदर्शिता की कमी रही है और कई निर्णयों में प्रभावशाली हस्तक्षेप की बात कही जा रही है।

हालांकि ये सभी आरोप अभी अनौपचारिक और जांच योग्य स्तर पर हैं।

💰 पैसा गया कहां? सबसे बड़ा रहस्य

सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब जमीन पर निर्माण स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देता, तो ₹6 लाख से अधिक राशि का उपयोग किस कार्य में हुआ?

भुगतान रिकॉर्ड में अलग-अलग एजेंसियों को भुगतान दर्शाया गया है, लेकिन कार्यस्थल पर उसका भौतिक प्रमाण ग्रामीणों को नहीं दिख रहा।

⚠️ क्या यह मामला सिर्फ रिकॉर्ड एंट्री का है या वास्तविक निर्माण का — यही जांच का मुख्य बिंदु बन गया है।

🏛️ क्या सिस्टम भी जिम्मेदार है?

ग्रामीणों का कहना है कि इतने बड़े स्तर पर भुगतान और स्वीकृति बिना विभागीय निगरानी के संभव नहीं है।

इसलिए अब सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या संबंधित विभागीय अधिकारी भी अपनी जिम्मेदारी निभाने में चूक गए?

❓ STING सवाल जो पूरे सिस्टम को हिला रहे हैं

  • क्या एक ही क्षेत्र को दो अलग-अलग मरघट के रूप में दिखाया गया?
  • जियो-टैग और जमीन की वास्तविकता में इतना अंतर क्यों?
  • ₹6 लाख खर्च होने के बावजूद निर्माण स्पष्ट क्यों नहीं?
  • क्या पंचायत रिकॉर्ड में गड़बड़ी या ओवरलैपिंग एंट्री हुई?

🔥 ग्राउंड रिपोर्ट यह मामला अब सिर्फ एक निर्माण योजना नहीं रहा, बल्कि पारदर्शिता, वित्तीय निगरानी और प्रशासनिक जवाबदेही का बड़ा सवाल बन चुका है।

ग्रामीणों ने पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय तकनीकी और वित्तीय जांच की मांग की है, ताकि यह साफ हो सके कि असल में जमीन पर काम हुआ या सिर्फ कागजों में कहानी लिखी गई।


👉 STING IMPACT LINE:


“30 फीट की दूरी, लेकिन दो अलग-अलग मरघट प्रोजेक्ट — क्या यह सिस्टम की गलती है या रिकॉर्ड गेम?”


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