नरसिंहपुर। (Narsinghpur History in Hindi) मध्य प्रदेश का दिल कहे जाने वाले महाकौशल क्षेत्र में स्थित नरसिंहपुर जिला आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है। यह पावन धरती अपनी समृद्ध कृषि, विशेष रूप से गन्ने के रिकॉर्ड उत्पादन, पवित्र नर्मदा नदी के सुरम्य घाटों और अनूठी सांस्कृतिक विरासत के लिए पूरे देश में एक विशिष्ट पहचान रखती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस गौरवशाली और ऐतिहासिक धरती पर आप रह रहे हैं, उसका नाम कैसे पड़ा? बहुत कम लोग इस बात से पूरी तरह वाकिफ हैं कि इस ऐतिहासिक जिले का नाम भगवान विष्णु के सबसे उग्र और पराक्रमी अवतार भगवान श्री नरसिंह के नाम पर रखा गया है। आज की नई पीढ़ी को अपने जिले के इस प्राचीन वैभव और इतिहास के बारे में जानना बेहद जरूरी है।

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ऐतिहासिक दस्तावेजों, गजेटियर और पुरानी जनश्रुतियों के गहन विश्लेषण से पता चलता है कि वर्तमान नरसिंहपुर शहर का प्राचीन नाम गड़रिया खेड़ा हुआ करता था। प्राचीन काल में यह एक अत्यंत छोटा, शांत और सीधा-साधा इलाका था, जहां मुख्य रूप से चरवाहे और किसान निवास करते थे। गड़रिया खेड़ा के रूप में इस क्षेत्र की पहचान कई दशकों तक बनी रही। लेकिन मराठा शासनकाल के दौरान यहाँ एक ऐसा अभूतपूर्व धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव हुआ, जिसने इस पूरे अंचल की नियति और पहचान को हमेशा-हमेशा के लिए बदल कर रख दिया।
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मराठा काल में स्थापित हुआ भगवान नरसिंह का भव्य मंदिर
इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जब इस क्षेत्र पर मराठा सरदारों और भोंसले राजाओं का शासन स्थापित हुआ, तब उनके संरक्षण में यहाँ एक बहुत बड़ा धार्मिक अनुष्ठान किया गया। मराठा सैनिकों और स्थानीय जमींदारों के सहयोग से इस छोटे से गड़रिया खेड़ा नामक स्थान पर भगवान श्री नरसिंह की एक अत्यंत भव्य, विशाल और ओजस्वी पाषाण मूर्ति स्थापित की गई और एक ऊंचे मंदिर का निर्माण कराया गया। यह मंदिर न केवल वास्तुकला का एक बेहतरीन नमूना था, बल्कि यह स्थानीय लोगों की अटूट आस्था का केंद्र बिंदु भी बन गया।

इस भव्य मंदिर की स्थापना के बाद आसपास के राज्यों और दूर-दराज के अंचलों से हजारों की संख्या में श्रद्धालु और व्यापारी यहाँ दर्शन व पूजा-अर्चना के लिए आने लगे। मंदिर के चारों ओर धीरे-धीरे बस्तियां बसने लगीं और व्यापारिक गतिविधियां भी तेज हो गईं। समय के साथ इस मंदिर की आध्यात्मिक ख्याति इतनी अधिक बढ़ गई कि लोगों ने इस पूरे क्षेत्र को इसके प्राचीन नाम ‘गड़रिया खेड़ा’ के बजाय आदरपूर्वक नरसिंहपुर के नाम से पुकारना शुरू कर दिया। जब ब्रिटिश काल और बाद में आज़ादी के बाद इसे स्वतंत्र जिले का दर्जा मिला, तो प्रशासनिक रूप से भी इसका नाम आधिकारिक तौर पर ‘नरसिंहपुर’ ही हमेशा के लिए तय कर दिया गया।
सनातन धर्म ग्रंथों और पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान श्री नरसिंह को भगवान विष्णु का चौथा और सबसे शक्तिशाली अवतार माना जाता है। उन्होंने अपने परम भक्त बाल प्रहलाद की रक्षा करने, संसार को क्रूर राजा हिरण्याकश्यप के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने और ब्रह्मांड में सत्य की स्थापना के लिए वैशाख चतुर्दशी को खंभे को फाड़कर आधा सिंह और आधा मनुष्य का उग्र रूप धारण किया था। भगवान नरसिंह को सनातन परंपरा में धर्म की स्थापना, निर्बलों की रक्षा, न्याय की विजय और हर तरह के अधर्म व अन्याय के अंत का सबसे बड़ा जीवंत प्रतीक माना जाता है। ऐसे रक्षक और पराक्रमी भगवान के नाम पर किसी जिले का नाम होना, यहाँ के प्रत्येक नागरिक के लिए परम सौभाग्य और गौरव की बात है।
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