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नरसिंहपुर में सांडों के आतंक के बीच आनंद चौरसिया की रेस्क्यू टीम सांड का रेस्क्यू करती हुई

चरनोई भूमि पर कब्जे से सड़कों पर आया गोवंश? नरसिंहपुर में सांडों के आतंक ने फिर उठाए बड़े सवाल

पांच लोगों को घायल करने वाले सांड का रेस्क्यू, कांग्रेस पार्षद आनंद चौरसिया की सक्रियता; सवाल—शहर में निराश्रित गोवंश के लिए स्थायी व्यवस्था कहां है?

नरसिंहपुर। शहर में निराश्रित एवं आवारा गोवंश, विशेषकर आक्रामक सांडों की समस्या अब केवल यातायात की परेशानी नहीं रह गई है, बल्कि यह सीधे नागरिकों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय बनती जा रही है।

हाल ही में एक सांड ने पांच लोगों को घायल कर दिया। प्राप्त जानकारी के अनुसार शिवकुमार जाट, पप्पू जाट, गोलू ठाकुर, प्रतीक साहू और रामलाल ठाकुर सांड के हमले में घायल हुए। इनमें शिवकुमार जाट को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। उनके सिर और पसली में चोट आने की जानकारी सामने आई है।

घटना की जानकारी मिलते ही नगर पालिका की टीम और पशु चिकित्सा विभाग के डॉक्टर मौके पर पहुंचे और आक्रामक सांड का रेस्क्यू कराया।

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घटना के समय आगे आए इंदिरा वार्ड पार्षद आनंद चौरसिया

घटना के बाद इंदिरा वार्ड के पार्षद आनंद चौरसिया भी सक्रिय हुए। उन्होंने नगर पालिका की टीम और पशु चिकित्सा अमले के साथ समन्वय कर सांड को पकड़वाने की कार्रवाई कराई।

आनंद चौरसिया की भूमिका इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि इससे पहले 23 अगस्त को गुदरी बाजार में बेकाबू सांड द्वारा वाहनों को गिराने और लोगों को घायल करने की घटना के बाद भी वे सक्रिय हुए थे। 24 अगस्त को कांग्रेस पार्षद दल ने इसी समस्या को लेकर नगर पालिका प्रशासन के खिलाफ अनोखा सांकेतिक प्रदर्शन किया था। पार्षदों ने स्वयं को पशुवाहन में कैद कर “सांडों को शहर से बाहर करो, नहीं तो हमें कर दो” का संदेश दिया था।

उस प्रदर्शन में कांग्रेस पार्षदों ने आवारा एवं आक्रामक सांडों को शहर से बाहर करने, नियमित पशु पकड़ने की व्यवस्था तथा खुले में कचरा फेंके जाने पर रोक लगाने की मांग की थी।

लेकिन सवाल सिर्फ एक सांड को पकड़ने का नहीं

एक आक्रामक सांड को पकड़ लेना तत्काल राहत जरूर देता है, लेकिन इससे समस्या समाप्त नहीं होती।

नरसिंहपुर में यदि अलग-अलग क्षेत्रों में लगातार आवारा गोवंश दिखाई दे रहा है और समय-समय पर सांडों के हमले की घटनाएं सामने आ रही हैं, तो अब प्रशासन को समस्या की जड़ तक जाना होगा।

सबसे बड़ा सवाल है—

आखिर गोवंश शहर की सड़कों तक पहुंच क्यों रहा है?

चरनोई भूमि का क्या हुआ?

हमारे ग्रामीण और पारंपरिक सामाजिक ढांचे में पशुओं के लिए चरनोई/चरागाह भूमि का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज ऐसी भूमि का उद्देश्य ही पशुओं के चरने और सामुदायिक उपयोग से जुड़ा रहा है।

लेकिन समय के साथ कई स्थानों पर चरनोई भूमि पर अतिक्रमण, कब्जे या उपयोग में बदलाव की शिकायतें सामने आती रही हैं।

इसलिए अब नरसिंहपुर में केवल सड़कों पर घूम रहे पशुओं की गिनती करना पर्याप्त नहीं होगा।

यह भी देखना होगा कि—

शहर और उसके आसपास राजस्व रिकॉर्ड में कितनी चरनोई भूमि दर्ज है?

उसमें से कितनी भूमि आज भी उपलब्ध है?

क्या किसी चरनोई भूमि पर अतिक्रमण है?

क्या किसी भूमि का उपयोग दूसरे प्रयोजन के लिए किया गया है?

और सबसे महत्वपूर्ण—

जब पशुओं के लिए चरने की जमीन कम होती जा रही है, तो निराश्रित गोवंश जाएगा कहां?

क्या चरनोई भूमि केवल गांव का विषय है?

इस सवाल पर भी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

शहरी विस्तार के साथ कई गांव और उनकी कृषि एवं सामुदायिक भूमि शहर की सीमा या उसके आसपास आ गई है। ऐसे में शहर और उसके आसपास के राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज सार्वजनिक एवं चरनोई भूमि की स्थिति की जांच जरूरी हो जाती है।

शहर के विस्तार के दौरान यदि ऐसी भूमि पर निर्माण, कब्जा या उपयोग परिवर्तन हुआ है तो उसका असर केवल राजस्व रिकॉर्ड पर नहीं पड़ता—इसका प्रभाव पशुओं और नागरिकों दोनों पर पड़ सकता है।

क्या गोवंश को जंगल में छोड़ देना समाधान है?

नहीं।

निराश्रित गायों और सांडों को शहर से पकड़कर जंगल या दूसरे ग्रामीण क्षेत्रों में छोड़ देना स्थायी समाधान नहीं हो सकता।

इससे दूसरे क्षेत्रों में फसल नुकसान, मानव-पशु संघर्ष और पशुओं की सुरक्षा से जुड़ी नई समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

इसी तरह पशुओं को शहर की सड़कों पर खुला छोड़ देना भी समाधान नहीं है।

जरूरत है ऐसी व्यवस्था की जिसमें पशुओं के लिए सुरक्षित आश्रय, भोजन, पानी और चिकित्सा उपलब्ध हो तथा नागरिकों की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो।

नगर पालिका की जिम्मेदारी

शहरी क्षेत्र में आवारा पशुओं की समस्या पर नगर पालिका की भूमिका महत्वपूर्ण है।

नियमित पशु पकड़ने की व्यवस्था, आक्रामक पशुओं की पहचान, सुरक्षित रेस्क्यू, पशु आश्रय, मालिकों की पहचान और सार्वजनिक स्थानों पर पशुओं के जमावड़े को रोकने जैसी व्यवस्थाओं को प्रभावी बनाना जरूरी है।

सिर्फ शिकायत मिलने के बाद पशुवाहन भेजना पर्याप्त नहीं होगा।

जरूरत है नियमित निगरानी की।

पशुपालन विभाग की भूमिका

आक्रामक, बीमार या घायल पशुओं के मामलों में पशु चिकित्सा विभाग की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।

ऐसे पशुओं की चिकित्सकीय जांच, सुरक्षित पकड़ और आगे की व्यवस्था के लिए नगर पालिका तथा पशु चिकित्सा विभाग के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है।

पशु मालिकों की जिम्मेदारी भी तय हो

हर आवारा पशु वास्तव में “निराश्रित” हो, यह जरूरी नहीं।

कई पशु मालिक अपने पशुओं को खुला छोड़ देते हैं और वे सड़क, बाजार तथा सार्वजनिक स्थानों पर घूमते रहते हैं।

यदि किसी पशु का मालिक है तो उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

गोसेवा का अर्थ पशु को सड़क पर छोड़ देना नहीं है।

जनता भी जिम्मेदार

इस समस्या में नागरिकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।

सड़क या बाजार में भोजन डालने से एक ही स्थान पर बड़ी संख्या में पशु जमा हो सकते हैं। इससे यातायात बाधित होता है और आक्रामक पशुओं के कारण दुर्घटना का खतरा बढ़ सकता है।

लोगों को अपने पालतू पशुओं को खुला छोड़ने से भी बचना चाहिए।

अब प्रशासन से मांगा जाना चाहिए पूरा हिसाब

नरसिंहपुर की जनता को अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि आंकड़ों के साथ जवाब चाहिए।

  • शहर में कितने निराश्रित गोवंश हैं?
  • नगर पालिका के पास कितने पशु पकड़ने वाले वाहन हैं?
  • पशुओं को रखने की व्यवस्था कितनी क्षमता की है?
  • पिछले एक वर्ष में कितने आवारा पशु पकड़े गए?
  • कितने पशु मालिकों को वापस किए गए?
  • कितने पशु गौशाला या आश्रय में भेजे गए?
  • सांडों के हमले की कितनी घटनाएं सामने आईं?
  • शहर और उसके आसपास कितनी चरनोई भूमि राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज है?
  • कितनी चरनोई भूमि पर अतिक्रमण दर्ज है?
  • अतिक्रमण हटाने के लिए कितनी कार्रवाई हुई?

एक सांड की घटना से आगे बढ़कर व्यवस्था पर सवाल

गुदरी बाजार की घटना में 20 से 25 वाहनों के गिरने और 8 से 10 लोगों के घायल होने की जानकारी सामने आई थी। इसके बाद कांग्रेस पार्षद दल ने सांकेतिक प्रदर्शन कर आवारा सांडों के मुद्दे को उठाया था।

अब एक और सांड द्वारा पांच लोगों को घायल किए जाने की घटना सामने आई है।

इन घटनाओं को अलग-अलग घटनाएं मानकर भूल जाना शायद समस्या का समाधान नहीं है।

ये घटनाएं शहर की पशु नियंत्रण व्यवस्था, कचरा प्रबंधन, पशु आश्रय और चरनोई भूमि की स्थिति—सभी को एक साथ देखने की जरूरत बताती हैं।

सरकार और जनता दोनों की जिम्मेदारी

सरकार की जिम्मेदारी है कि वह कानून और उपलब्ध प्रशासनिक व्यवस्था के अनुसार निराश्रित पशुओं के लिए सुरक्षित व्यवस्था करे और सार्वजनिक स्थानों पर आवारा पशुओं से नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे।

राजस्व प्रशासन की जिम्मेदारी है कि सार्वजनिक उपयोग एवं चरनोई भूमि के रिकॉर्ड की सुरक्षा और अतिक्रमण संबंधी मामलों पर नियमानुसार कार्रवाई सुनिश्चित हो।

नगर पालिका की जिम्मेदारी है कि शहर में आवारा पशुओं का प्रभावी नियंत्रण और सुरक्षित रेस्क्यू व्यवस्था बनाए।

पशु मालिकों की जिम्मेदारी है कि वे अपने पशुओं को सार्वजनिक सड़कों पर खुला न छोड़ें।

और जनता की जिम्मेदारी है कि वह समस्या को बढ़ाने वाली गतिविधियों से बचे और आवारा या आक्रामक पशुओं की सूचना प्रशासन को दे।

गोवंश की सुरक्षा भी जरूरी और इंसान की जान भी

नरसिंहपुर में सांडों की लगातार सामने आ रही घटनाएं यह सवाल पूछ रही हैं कि क्या हम हर बार किसी हादसे का इंतजार करेंगे?

या फिर समस्या की जड़ तक जाकर यह पता लगाएंगे कि निराश्रित गोवंश के लिए उपलब्ध जमीन, चरनोई भूमि, पशु आश्रय और नगर की पशु नियंत्रण व्यवस्था की वास्तविक स्थिति क्या है?

सड़क न गाय का स्थायी घर है, न सांड का।

जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें चरनोई भूमि सुरक्षित रहे, अतिक्रमण पर कार्रवाई हो, पशु सुरक्षित रहें और शहर के नागरिक भी भयमुक्त होकर सड़कों पर चल सकें।

अब समय है कि नरसिंहपुर में सांडों को पकड़ने के साथ-साथ उस व्यवस्था को भी पकड़ा जाए, जिसके कारण समस्या बार-बार पैदा हो रही है।

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