रेत खदानों की जानकारी मांगने पर खनिज अधिकारी ने कंपनी से पूछा—आपत्ति है तो क्यों? पत्र में वाणिज्यिक विश्वास, व्यापार गोपनीयता और प्रतियोगी स्थिति का भी किया उल्लेख
नरसिंहपुर। में रेत खदान RTI के जरिए सरकारी रिकॉर्ड मांगे जाने के बाद खनिज अधिकारी ने विंध्यवासिनी माइनिंग वर्क्स से आपत्ति मांगी है।जिले की रेत खदानों से जुड़े सरकारी रिकॉर्ड और व्यवस्थाओं की जानकारी सूचना के अधिकार के तहत मांगना अब एक दिलचस्प सवाल में बदल गया है। वजह है खनिज विभाग द्वारा संबंधित रेत कंपनी को भेजा गया वह पत्र, जिसमें आवेदक को जानकारी उपलब्ध कराने से पहले कंपनी से ही पूछा गया कि उसे इस जानकारी पर कोई आपत्ति है या नहीं।
यह RTI मैंने स्वयं 11 मई 2026 को खनिज विभाग में लगाई थी। आवेदन में जिले की रेत खदानों, उनके ठेके, स्वीकृत क्षेत्रफल, स्वीकृत खनन मात्रा, खनन अनुमति, पर्यावरणीय स्वीकृति, रॉयल्टी, रेत की बिक्री दर और खनिज जांच नाकों से संबंधित सरकारी रिकॉर्ड की प्रमाणित प्रतियां मांगी गई थीं।
लेकिन 21 मई को खनिज विभाग की ओर से जारी पत्र ने इस पूरे मामले को नया सवाल दे दिया।
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कंपनी को लिखा गया पत्र बना सवाल का केंद्र
खनिज विभाग के पत्र क्रमांक 307/खनिज/2026 दिनांक 21 मई 2026 में मेरी RTI में मांगी गई जानकारी के संदर्भ में विंध्यवासिनी माइनिंग वर्क्स एल.एल.पी. को पत्र भेजा गया।
पत्र में कहा गया कि जिले में खनिज रेत खदान अनुज्ञप्ति की स्वीकृति रेत कंपनी एवं शासन के मध्य हुई है। इसके बाद पत्र में यह उल्लेख किया गया कि संबंधित प्रमाणित दस्तावेज दिए जाने से “वाणिज्यिक विश्वास, व्यापार गोपनीयता या बौद्धिक सम्पदा” से संबंधित विषय हो सकता है और इससे किसी व्यक्ति या कंपनी की “प्रतियोगी स्थिति को नुकसान” होने की बात सामने आ सकती है।
इसके बाद कंपनी से पूछा गया कि उसे कोई आपत्ति है या नहीं और यदि आपत्ति है तो उसका कारण स्पष्ट करते हुए विभाग को सूचित किया जाए।
यानी विभाग ने कंपनी को केवल सूचना नहीं भेजी, बल्कि कंपनी की आपत्ति को लेकर बाकायदा उसका पक्ष मांगा।


सवाल—आखिर किस जानकारी को व्यापारिक गोपनीयता माना जा रहा है?
यहीं से इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है।
मेरी RTI में रेत खदानों का स्वीकृत क्षेत्रफल, स्वीकृत खनन मात्रा, खनन अनुमति, पर्यावरणीय स्वीकृति, रॉयल्टी, बिक्री दर और खनिज जांच नाकों की जानकारी मांगी गई थी।
अब सवाल यह है कि इनमें से कौन-सी जानकारी ऐसी है जिसके सार्वजनिक होने से किसी कंपनी की प्रतियोगी स्थिति प्रभावित हो सकती है?
क्या किसी रेत खदान का स्वीकृत क्षेत्रफल कंपनी का व्यापारिक रहस्य है?
क्या शासन द्वारा दी गई खनन अनुमति निजी व्यापारिक गोपनीयता है?
क्या पर्यावरणीय स्वीकृति को सार्वजनिक किए जाने से किसी कंपनी की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति प्रभावित होगी?
क्या शासन को जमा की जाने वाली रॉयल्टी की जानकारी कंपनी की व्यापारिक गोपनीयता है?
और यदि ऐसा है तो विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि RTI के कौन-कौन से बिंदु किस कानूनी अपवाद के अंतर्गत आते हैं।
कंपनी से आपत्ति पूछना अलग बात, चिंता जताना अलग?
यहां सवाल यह नहीं है कि किसी तीसरे पक्ष को उसकी आपत्ति बताने का अवसर क्यों दिया गया। कानून में कुछ परिस्थितियों में तीसरे पक्ष से संबंधित सूचना पर उसकी बात जानने की प्रक्रिया हो सकती है।
सवाल पत्र की भाषा और उसके आधार को लेकर है।
यदि विभाग केवल कंपनी की आपत्ति जानना चाहता था तो कंपनी को सूचना देकर उसका पक्ष पूछा जा सकता था। लेकिन पत्र में पहले ही वाणिज्यिक विश्वास, व्यापार गोपनीयता, बौद्धिक संपदा और प्रतियोगी स्थिति को नुकसान जैसे आधारों का उल्लेख किया गया।
ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या विभाग केवल कंपनी की आपत्ति जान रहा था या कंपनी के संभावित हितों को ध्यान में रखकर सूचना रोकने का आधार भी तलाश रहा था?
इसका जवाब खनिज विभाग ही दे सकता है।
RTI लगाने वाले को अभिलेख चाहिए, नई जानकारी नहीं
मेरे मूल आवेदन में मैंने कोई नई रिपोर्ट तैयार करने या विभाग से कोई विश्लेषण करवाने की मांग नहीं की थी।
मैंने उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड की प्रमाणित प्रतियां मांगी थीं।
पहले विभाग की ओर से यह कहा गया कि विस्तृत जानकारी बनाकर नहीं दी जा सकती और अभिलेखों के निरीक्षण की बात कही गई। इसके बाद संबंधित कंपनी को पत्र भेजकर आपत्ति मांगी गई।
यहीं पर पारदर्शिता को लेकर सवाल और गंभीर हो जाता है।
जब खदानों का संचालन सरकारी अनुमति के आधार पर हो रहा है, पर्यावरणीय स्वीकृतियां सरकारी प्रक्रिया का हिस्सा हैं और रॉयल्टी शासन के राजस्व से जुड़ी है, तो इनसे संबंधित रिकॉर्ड की जानकारी पाने में इतनी जटिलता क्यों?
अब प्रथम अपील भी लंबित
जानकारी उपलब्ध नहीं होने के बाद मैंने 19 जून 2026 को प्रथम अपील भी प्रस्तुत की थी। लेकिन अब 31 अगस्त 2026 तक प्रथम अपील पर भी मुझे कोई प्रभावी निर्णय या मांगी गई पूरी जानकारी प्राप्त नहीं हुई है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल यही है—
RTI में सरकारी रिकॉर्ड मांगा गया था, लेकिन खनिज विभाग की पहली चिंता कंपनी की आपत्ति और उसकी प्रतियोगी स्थिति को लेकर क्यों दिखाई दी?
यदि जानकारी कानून के तहत रोकी जा सकती है तो उसका स्पष्ट आधार सामने आना चाहिए।
यदि जानकारी सार्वजनिक की जा सकती है तो उसे उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
क्योंकि सवाल किसी एक कंपनी का नहीं है।
सवाल है—नरसिंहपुर की रेत खदानों से जुड़े सरकारी रिकॉर्ड आखिर कितने पारदर्शी हैं और उन्हें जनता के सामने लाने में विभाग को इतनी सावधानी क्यों बरतनी पड़ रही है?
अब इस सवाल का जवाब दस्तावेजों और नियमों के आधार पर खनिज विभाग को ही देना होगा।
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