नरसिंहपुर। जिला चिकित्सालय नरसिंहपुर में दिव्यांगजनों को पार्किंग शुल्क से छूट देने के लिखित निर्देश जारी होने के बावजूद पार्किंग स्थल पर सूचना बोर्ड नहीं लगाया गया है। वहीं, दिव्यांगजनों को अस्पताल लाने-ले जाने वाले वाहनों से भी पार्किंग शुल्क वसूले जाने के आरोप हैं। पार्किंग शुल्क की निर्धारित दरों की रेट लिस्ट प्रदर्शित नहीं होने का मुद्दा भी सामने है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब सिविल सर्जन कार्यालय ने छूट संबंधी निर्देश जारी किए थे, तो उनका पालन सुनिश्चित क्यों नहीं कराया गया?
एक दिव्यांग की शिकायत पर आयुक्त ने लिया संज्ञान
प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार, जिला चिकित्सालय में दिव्यांगजन के वाहन से पार्किंग शुल्क वसूले जाने के संबंध में एक दिव्यांग व्यक्ति ने आयुक्त, दिव्यांगजन, मध्यप्रदेश के समक्ष शिकायत प्रस्तुत की थी। शिकायत के बाद आयुक्त कार्यालय ने 1 सितंबर 2026 को पत्र क्रमांक टी-3/एफ-पी.ए/26-27/1113 जारी किया।
इस पत्र के संदर्भ में सिविल सर्जन-सह-मुख्य अस्पताल अधीक्षक, जिला चिकित्सालय नरसिंहपुर के कार्यालय से पत्र क्रमांक निविदा/2026/5880 जारी किया गया। यह पत्र पार्किंग ठेकेदार मेसर्स आदित्य ट्रेडर्स एंड कॉन्ट्रैक्टर को संबोधित था। इसमें दिव्यांगजनों को पार्किंग शुल्क से छूट देने तथा इसकी जानकारी देने वाला सूचना बोर्ड लगाने के निर्देश दिए गए थे।
लेकिन उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पार्किंग स्थल पर सूचना बोर्ड नहीं लगाया गया है। ऐसे में सवाल यह है कि लिखित निर्देश जारी करने के बाद उनके पालन की निगरानी किसने की और बोर्ड लगाने की जिम्मेदारी पूरी क्यों नहीं हुई?
लिखित आदेश, लेकिन सूचना बोर्ड नदारद
दिव्यांगजनों को पार्किंग शुल्क से छूट की जानकारी देने के लिए सूचना बोर्ड लगाया जाना जरूरी है, ताकि अस्पताल आने वाले दिव्यांगजन और उनके साथ आने वाले वाहन चालक नियमों को समझ सकें। बोर्ड नहीं होने से लोगों को छूट की जानकारी मिलने में परेशानी हो सकती है और पार्किंग स्थल पर शुल्क को लेकर विवाद की स्थिति बन सकती है।
जब सिविल सर्जन कार्यालय ने ठेकेदार को सूचना बोर्ड लगाने के निर्देश दिए थे, तो उसका पालन सुनिश्चित करना आवश्यक था। यदि निर्देश के बावजूद बोर्ड नहीं लगाया गया, तो यह जांच का विषय है कि ठेकेदार ने आदेश का पालन क्यों नहीं किया और अस्पताल प्रबंधन ने इस संबंध में क्या कार्रवाई की।
दिव्यांगजनों को लाने-ले जाने वाले ऑटो और निजी एंबुलेंस से भी शुल्क वसूली के आरोप
दिव्यांगजन जिला चिकित्सालय में उपचार, जांच और दिव्यांगता प्रमाणपत्र बनवाने के लिए अलग-अलग साधनों से पहुंचते हैं। कई लोग मित्रों या रिश्तेदारों की दोपहिया अथवा चारपहिया गाड़ियों से आते हैं, जबकि कुछ को ऑटो या निजी एंबुलेंस की सहायता लेनी पड़ती है।
आरोप है कि दिव्यांगजनों को अस्पताल लाने-ले जाने वाले ऑटो, निजी एंबुलेंस और अन्य वाहनों से भी पार्किंग शुल्क वसूला जाता है। दिव्यांगजन को अस्पताल में छोड़कर वापस जाने वाले वाहनों से शुल्क लिए जाने का मुद्दा भी उठ रहा है।
ऐसे में यह स्पष्ट होना चाहिए कि जारी लिखित आदेश किन परिस्थितियों में और किन वाहनों पर लागू होता है। क्या दिव्यांगजन को छोड़कर जाने वाले या उन्हें लेने आने वाले वाहनों को छूट मिलती है? ऑटो और निजी एंबुलेंस के संबंध में क्या नियम हैं? इन सवालों का जवाब मूल आदेश और पार्किंग अनुबंध की शर्तों के आधार पर दिया जाना चाहिए।
यदि आदेश के दायरे में आने वाले वाहनों से शुल्क वसूला गया है, तो संबंधित शिकायतों की जांच कर जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। पार्किंग कर्मचारियों को भी छूट के नियमों की स्पष्ट जानकारी दी जानी चाहिए, ताकि दिव्यांगजनों और उनके साथ आने वाले लोगों को अनावश्यक परेशानी का सामना न करना पड़े।

पार्किंग शुल्क की रेट लिस्ट भी प्रदर्शित नहीं
पार्किंग स्थल पर केवल दिव्यांगजनों को मिलने वाली छूट की जानकारी ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि वाहनों के लिए निर्धारित पार्किंग शुल्क की रेट लिस्ट प्रदर्शित होना भी जरूरी है। यदि निर्धारित दरों की सूची सार्वजनिक रूप से दिखाई नहीं देती, तो वाहन चालकों के लिए यह जानना मुश्किल हो सकता है कि किस वाहन के लिए कितना शुल्क निर्धारित है।
पार्किंग स्थल पर रेट लिस्ट प्रदर्शित नहीं होने से संबंधित सवाल भी उठ रहे हैं। अस्पताल प्रबंधन को स्पष्ट करना चाहिए कि पार्किंग शुल्क की दरें कहां और किस प्रकार प्रदर्शित की गई हैं। साथ ही, छूट संबंधी सूचना बोर्ड नहीं लगाए जाने की स्थिति में यह भी बताया जाना चाहिए कि लिखित निर्देशों के अनुपालन की जांच कब की गई।
दरों और छूट की जानकारी स्पष्ट रूप से प्रदर्शित होने से वाहन चालकों को नियमों की जानकारी मिलेगी और शुल्क वसूली को लेकर विवाद की गुंजाइश कम होगी।
आदेश का पालन नहीं हुआ तो जिम्मेदारी किसकी?
सिविल सर्जन कार्यालय के पत्र में निर्देशों के उल्लंघन या शिकायत मिलने पर निविदा एवं अनुबंध की शर्तों के अनुसार कार्रवाई किए जाने का उल्लेख बताया गया है। ऐसे में सवाल है कि जब सूचना बोर्ड नहीं लगाया गया और शुल्क वसूली को लेकर आरोप सामने आ रहे हैं, तो ठेकेदार से जवाब मांगा गया या नहीं?
क्या अस्पताल प्रबंधन ने पार्किंग स्थल की जांच की? क्या ठेकेदार को लिखित निर्देशों का पालन करने के लिए कहा गया? क्या शुल्क वसूली से संबंधित शिकायतों का रिकॉर्ड रखा गया? यदि आदेश का पालन नहीं हुआ, तो अनुबंध की शर्तों के तहत कार्रवाई की गई या नहीं?
इन सवालों का जवाब सार्वजनिक होना चाहिए, ताकि स्पष्ट हो सके कि दिव्यांगजनों को दी गई छूट केवल कागजों तक सीमित है या उसका वास्तविक लाभ भी मिल रहा है।
सिविल सर्जन और ठेकेदार का पक्ष सामने आना जरूरी
मामले में पार्किंग ठेकेदार मेसर्स आदित्य ट्रेडर्स एंड कॉन्ट्रैक्टर और जिला चिकित्सालय प्रबंधन का आधिकारिक पक्ष महत्वपूर्ण है। ठेकेदार को स्पष्ट करना चाहिए कि लिखित निर्देश के बावजूद सूचना बोर्ड क्यों नहीं लगाया गया और पार्किंग शुल्क वसूली के आरोपों पर उसका क्या कहना है।
वहीं, सिविल सर्जन-सह-मुख्य अस्पताल अधीक्षक कार्यालय को बताना चाहिए कि निर्देश जारी करने के बाद उनके पालन की निगरानी कैसे की गई और सूचना बोर्ड नहीं लगाए जाने पर क्या कार्रवाई की गई। पार्किंग शुल्क की रेट लिस्ट प्रदर्शित होने की स्थिति भी स्पष्ट की जानी चाहिए।
निष्कर्ष: एक दिव्यांग व्यक्ति की शिकायत के बाद आयुक्त कार्यालय के पत्र के संदर्भ में सिविल सर्जन कार्यालय ने पार्किंग ठेकेदार को दिव्यांगजनों को शुल्क से छूट देने और सूचना बोर्ड लगाने के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद सूचना बोर्ड नहीं लगाए जाने और दिव्यांगजनों को लाने-ले जाने वाले वाहनों से शुल्क वसूली के आरोपों ने व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं। अब देखना होगा कि अस्पताल प्रबंधन और ठेकेदार इस स्थिति पर क्या जवाब देते हैं और लिखित निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।
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