मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने जिस विद्यालय के नवीन भवन का लोकार्पण किया, उसी के प्राचार्य की सहभागिता कार्यक्रम की सार्वजनिक तस्वीरों और वीडियो में प्रमुखता से नजर नहीं आई।
नरसिंहपुर। किसी विद्यालय का नवीन भवन केवल एक इमारत नहीं होता, बल्कि उससे विद्यार्थियों, शिक्षकों और अभिभावकों की उम्मीदें जुड़ी होती हैं। जब मुख्यमंत्री जैसे प्रदेश के सर्वोच्च कार्यकारी पद पर आसीन व्यक्ति उसी विद्यालय के भवन का लोकार्पण करने पहुंचते हैं, तो यह उस संस्था के लिए गौरव का अवसर होता है। ऐसे अवसर पर विद्यालय के प्राचार्य और पूरे स्टाफ की सहभागिता भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। लेकिन सांदीपनि विद्यालय के लोकार्पण कार्यक्रम से जुड़ी तस्वीरों और वीडियो को देखकर एक सवाल उठता है—जिस विद्यालय का लोकार्पण हुआ, उसके प्राचार्य प्रभात मिश्रा को कार्यक्रम में कितनी प्रमुखता मिली?
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने विद्यालय में विद्यार्थियों से मुलाकात की और उनसे संवाद किया। इस दौरान सामने आई तस्वीरों में जनप्रतिनिधि मुख्यमंत्री के साथ बैठे दिखाई दिए, जबकि प्राचार्य प्रभात मिश्रा चर्चा के दौरान पीछे खड़े नजर आए। जनसंपर्क विभाग की ओर से सामने आई तस्वीरों और वीडियो में प्राचार्य की सहभागिता भी उस तरह प्रमुखता से दिखाई नहीं देती, जैसी किसी महत्वपूर्ण शासकीय आयोजन में विद्यालय प्रमुख की भूमिका को लेकर अपेक्षा की जा सकती है।
सांदीपनि विद्यालय के लोकार्पण कार्यक्रम से संबंधित कलेक्टर नरसिंहपुर की फेसबुक पोस्ट देखने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें। https://www.facebook.com/collectornarsinghpur
प्राचार्य से फोन पर बात कर खबर की तथ्यात्मक पुष्टि
इस मामले में केवल तस्वीरों के आधार पर निष्कर्ष निकालने के बजाय प्राचार्य प्रभात मिश्रा से फोन पर संपर्क किया गया। उनसे पूछा गया कि क्या मुख्यमंत्री के साथ उनकी मुलाकात, चर्चा या संवाद की कोई तस्वीर अथवा वीडियो उनके पास उपलब्ध है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि कहीं कार्यक्रम से जुड़ा कोई ऐसा दृश्य तो नहीं है, जो सार्वजनिक रूप से सामने आई तस्वीरों से अलग जानकारी देता हो।
प्राचार्य ने भी मुख्यमंत्री के साथ अपनी कोई तस्वीर या वीडियो उपलब्ध नहीं होने की बात कही। इस जानकारी के बाद कार्यक्रम की व्यवस्थाओं और विद्यालय प्रमुख की सहभागिता को लेकर उठ रहे सवालों का महत्व और बढ़ जाता है।
यहां मुद्दा केवल इतना नहीं है कि प्राचार्य की मुख्यमंत्री के साथ तस्वीर सामने आई या नहीं। असली सवाल यह है कि विद्यालय के इतने महत्वपूर्ण अवसर पर प्राचार्य और उनके स्टाफ की भूमिका किस रूप में निर्धारित की गई थी। क्या उन्हें विद्यालय की शैक्षणिक गतिविधियों, उपलब्धियों और विद्यार्थियों से संबंधित जानकारी प्रस्तुत करने का अवसर मिला? यदि मिला, तो उसकी झलक सार्वजनिक तस्वीरों और वीडियो में क्यों नहीं दिखाई देती?

प्राचार्य की उपेक्षा का संदेश विद्यार्थियों और अभिभावकों तक क्या पहुंचता है?
किसी संस्था के प्रमुख को महत्वपूर्ण कार्यक्रम में अपेक्षित स्थान और सहभागिता नहीं मिलती दिखाई दे, तो उसका असर केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। विद्यालय के विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों के मन में भी यह सवाल उठ सकता है कि जिस प्राचार्य के नेतृत्व में विद्यालय संचालित होता है, उसी को संस्था के गौरवपूर्ण अवसर पर कितनी अहमियत दी गई।
प्राचार्य और शिक्षकों के लिए भी ऐसा अवसर भावनात्मक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है। विद्यालय की व्यवस्था संभालने वाले पूरे स्टाफ की मेहनत, जिम्मेदारी और योगदान को सार्वजनिक मंच पर उचित स्थान मिलना संस्था का मनोबल बढ़ाता है। इसके विपरीत, यदि कार्यक्रम की तस्वीरों में विद्यालय प्रमुख और उनके स्टाफ की सामूहिक सहभागिता दिखाई ही न दे, तो स्वाभाविक रूप से उनकी भूमिका को लेकर चर्चा हो सकती है।
हालांकि, प्राचार्य, स्टाफ, विद्यार्थियों या अभिभावकों ने इस संबंध में कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया दी हो, ऐसी जानकारी उपलब्ध नहीं है। इसलिए उनके मन की स्थिति के बारे में कोई निश्चित दावा नहीं किया जा सकता। लेकिन यह सवाल जरूर उठता है कि ऐसे दृश्य विद्यालय परिवार के सम्मान और मनोबल के संदर्भ में क्या संदेश देते हैं।

पूरे स्टाफ के साथ एक समूह तस्वीर होती, तो विद्यालय की शोभा बढ़ती
मुख्यमंत्री के साथ विद्यालय के प्राचार्य और पूरे स्टाफ की एक सामूहिक तस्वीर कार्यक्रम की यादगार बन सकती थी। ऐसी तस्वीर विद्यालय के लिए गौरव का विषय होती और उसे संस्था की उपलब्धियों के रिकॉर्ड में भी सुरक्षित रखा जा सकता था। इससे यह संदेश भी जाता कि विद्यालय के संचालन में योगदान देने वाले शिक्षकों और कर्मचारियों को महत्वपूर्ण अवसर पर साथ लेकर चला गया।
यह कोई असाधारण मांग नहीं, बल्कि संस्था के प्रति सम्मान और सामूहिक सहभागिता को प्रदर्शित करने का एक सामान्य तरीका है। यदि ऐसी समूह तस्वीर ली गई हो और सार्वजनिक नहीं की गई हो, तो संबंधित विभाग उसे सामने लाकर स्थिति स्पष्ट कर सकता है। लेकिन यदि ऐसी तस्वीर ली ही नहीं गई, तो यह जानना उचित होगा कि विद्यालय के प्राचार्य और स्टाफ को सामूहिक रूप से शामिल करने की व्यवस्था क्यों नहीं हुई।

क्या प्राचार्य और स्टाफ खुलकर अपनी बात रख पाएंगे?
शासकीय संस्थाओं में कार्यरत अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए सार्वजनिक कार्यक्रमों की व्यवस्थाओं पर खुलकर प्रतिक्रिया देना हमेशा आसान नहीं होता। इसलिए यह अपेक्षा करना भी उचित नहीं होगा कि प्राचार्य या स्टाफ सामने आकर किसी व्यवस्था पर खुलकर सवाल उठाएं। उनकी चुप्पी को सहमति या असहमति का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
ऐसे मामलों में संबंधित अधिकारियों और आयोजकों की जिम्मेदारी है कि वे स्वयं स्थिति स्पष्ट करें। किसी विद्यालय के प्रमुख को लेकर उठे सवालों का जवाब उसी संस्था के कर्मचारियों से सार्वजनिक बयान देने की अपेक्षा करके नहीं, बल्कि कार्यक्रम की वास्तविक व्यवस्था और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर दिया जाना चाहिए।
जिला प्रशासन और जनसंपर्क विभाग से स्पष्टीकरण अपेक्षित
इस पूरे मामले में यह कहना जल्दबाजी होगी कि प्राचार्य की जानबूझकर उपेक्षा की गई। उपलब्ध तस्वीरों और प्राचार्य से हुई बातचीत के आधार पर किसी की मंशा तय नहीं की जा सकती। लेकिन यह सवाल अनदेखा भी नहीं किया जा सकता कि मुख्यमंत्री के हाथों विद्यालय के नवीन भवन के लोकार्पण जैसे महत्वपूर्ण अवसर पर विद्यालय प्रमुख और उनके स्टाफ की सहभागिता सार्वजनिक रूप से स्पष्ट क्यों नहीं दिखाई देती।
जिला प्रशासन, कार्यक्रम के आयोजकों और जनसंपर्क विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि कार्यक्रम में विद्यालय प्रबंधन की क्या भूमिका निर्धारित की गई थी, प्राचार्य को मुख्यमंत्री के समक्ष विद्यालय की जानकारी प्रस्तुत करने का अवसर मिला था या नहीं और क्या प्राचार्य व पूरे स्टाफ के साथ सामूहिक तस्वीर ली गई थी।
विद्यालय का लोकार्पण केवल भवन का उद्घाटन नहीं, बल्कि उस संस्था से जुड़े लोगों के योगदान को सम्मान देने का अवसर भी है। ऐसे में सवाल किसी व्यक्ति विशेष के सम्मान तक सीमित नहीं, बल्कि शासकीय कार्यक्रमों में विद्यालय परिवार की सहभागिता और गरिमा से जुड़ा है। संबंधित विभाग का पक्ष सामने आने पर ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि तस्वीरों में दिखाई देने वाली स्थिति के पीछे वास्तविक कारण क्या था।
डिस्क्लेमर: यह खबर कलेक्टर एवं प्राचार्य की फेसबुक पोस्ट तथा कार्यक्रम से संबंधित सार्वजनिक तस्वीरों और वीडियो के अवलोकन एवं प्राचार्य से फोन पर हुई बातचीत के आधार पर तैयार की गई है। खबर का उद्देश्य किसी व्यक्ति की छवि को नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि कार्यक्रम में विद्यालय प्रबंधन की सहभागिता से जुड़े सवालों को सामने लाना है। संबंधित अधिकारियों एवं विभाग का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रकाशित किया जाएगा।
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