RPwD Act, 2016 क्यों लाया गया? — 1995 के कानून से अधिकार आधारित कानून तक की यात्रा
प्रस्तावना
भारत में लंबे समय तक दिव्यांगता को सहानुभूति, दया और कल्याण (Welfare) के दृष्टिकोण से देखा जाता रहा। दिव्यांगजन को समाज का समान अधिकार वाला नागरिक नहीं, बल्कि सहायता पाने वाला व्यक्ति माना जाता था। सरकार की योजनाएँ भी मुख्यतः पेंशन, ट्राइसाइकिल, व्हीलचेयर, छात्रवृत्ति और आरक्षण तक सीमित थीं। परिणामस्वरूप दिव्यांगजन शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, न्याय और सार्वजनिक जीवन में बराबरी से भाग नहीं ले पाते थे।
सन् 1995 में भारत सरकार ने पहला व्यापक कानून बनाया—Persons with Disabilities (Equal Opportunities, Protection of Rights and Full Participation) Act, 1995। यह अपने समय का महत्वपूर्ण कानून था, लेकिन बदलते समय, अंतरराष्ट्रीय मानकों और दिव्यांगजनों की वास्तविक आवश्यकताओं के सामने इसकी कई सीमाएँ स्पष्ट होने लगीं।
इसी बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दिव्यांग अधिकारों को लेकर एक ऐतिहासिक परिवर्तन हुआ। संयुक्त राष्ट्र ने Convention on the Rights of Persons with Disabilities (UNCRPD) को अपनाया और भारत ने वर्ष 2007 में इस संधि का अनुमोदन (Ratification) किया। इसके बाद भारत पर यह दायित्व आया कि वह अपने कानूनों को UNCRPD के सिद्धांतों के अनुरूप बनाए।
इन्हीं कारणों से Rights of Persons with Disabilities Act, 2016 (RPwD Act, 2016) बनाया गया। यह केवल नया कानून नहीं था, बल्कि सोच में परिवर्तन (Paradigm Shift) था—दिव्यांगजन को दया का पात्र नहीं, बल्कि अधिकारों वाला नागरिक मानने की दिशा में एक बड़ा कदम।
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1995 का कानून क्यों पर्याप्त नहीं था?
1995 का अधिनियम अपने समय के लिए प्रगतिशील था, लेकिन उसमें कई गंभीर सीमाएँ थीं।
1. दिव्यांगता की सीमित परिभाषा
1995 के कानून में केवल 7 प्रकार की दिव्यांगताओं को मान्यता दी गई थी।
समय के साथ यह स्पष्ट हुआ कि अनेक ऐसी स्थितियाँ हैं जो व्यक्ति के जीवन को गंभीर रूप से प्रभावित करती हैं, लेकिन उन्हें कानूनी पहचान ही नहीं मिली थी।
उदाहरण के लिए—
- ऑटिज़्म
- सेरेब्रल पाल्सी
- थैलेसीमिया
- हीमोफीलिया
- मल्टीपल स्क्लेरोसिस
- पार्किंसन रोग
- एसिड अटैक से प्रभावित व्यक्ति
- बौद्धिक एवं बहुविकलांगता जैसी कई अवस्थाएँ।
इन व्यक्तियों को कई बार सरकारी योजनाओं और अधिकारों का लाभ नहीं मिल पाता था।
2. कल्याण आधारित (Welfare Model) सोच
1995 का कानून मुख्यतः इस विचार पर आधारित था कि सरकार दिव्यांगजनों की सहायता करेगी।
इसमें पेंशन, आरक्षण और कुछ सुविधाओं पर अधिक ध्यान था।
लेकिन यह स्पष्ट रूप से यह नहीं कहता था कि दिव्यांगजन भी अन्य नागरिकों की तरह समान अधिकार रखते हैं और राज्य की जिम्मेदारी है कि वह उन अधिकारों को सुनिश्चित करे।
3. Accessibility (सुगम्यता) पर पर्याप्त जोर नहीं
सार्वजनिक भवनों, परिवहन, सूचना, संचार और सेवाओं को दिव्यांग-अनुकूल बनाने के लिए प्रभावी कानूनी व्यवस्था कमजोर थी।
परिणामस्वरूप—
- सरकारी कार्यालयों में रैंप नहीं बने।
- रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड सुलभ नहीं हुए।
- विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पर्याप्त व्यवस्था नहीं हुई।
- सरकारी वेबसाइटें और डिजिटल सेवाएँ भी सभी के लिए सुलभ नहीं थीं।
4. जवाबदेही (Accountability) का अभाव
1995 के कानून में यह स्पष्ट व्यवस्था नहीं थी कि यदि कोई विभाग दिव्यांगजन के अधिकारों का पालन नहीं करता, तो उसकी जिम्मेदारी कैसे तय होगी।
इस कारण कई प्रावधान व्यवहार में प्रभावी नहीं हो सके।
UNCRPD ने क्या बदला?
संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2006 में Convention on the Rights of Persons with Disabilities (UNCRPD) को अपनाया।
भारत ने 1 अक्टूबर 2007 को इसका अनुमोदन किया।
इसका अर्थ था कि भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह स्वीकार किया कि वह दिव्यांगजनों के अधिकारों की रक्षा करेगा और अपने कानूनों को इन सिद्धांतों के अनुरूप बनाएगा।
UNCRPD का सबसे बड़ा संदेश
UNCRPD ने कहा—
“दिव्यांगता व्यक्ति की कमी नहीं है; वास्तविक समस्या समाज में मौजूद बाधाएँ (Barriers) हैं।”
यदि किसी भवन में रैंप नहीं है, तो समस्या व्यक्ति नहीं, भवन की है।
यदि विद्यालय दिव्यांग छात्र को प्रवेश नहीं देता, तो समस्या छात्र नहीं, व्यवस्था की है।
यदि सरकारी वेबसाइट स्क्रीन रीडर से नहीं चलती, तो समस्या दृष्टिबाधित व्यक्ति नहीं, वेबसाइट की है।
यही सोच आगे चलकर RPwD Act, 2016 का आधार बनी।
RPwD Act, 2016 ने क्या बदला?
1. Welfare से Rights की ओर
सबसे बड़ा परिवर्तन यही था।
पहले सरकार कहती थी—
“हम सहायता देंगे।”
अब कानून कहता है—
“दिव्यांगजन का अधिकार है और सरकार की जिम्मेदारी है कि वह उसे सुनिश्चित करे।”
यानी दिव्यांगजन किसी पर उपकार नहीं मांग रहे, बल्कि अपने वैधानिक अधिकारों की मांग कर रहे हैं।
2. दिव्यांगताओं की संख्या 7 से बढ़ाकर 21
नए कानून में दिव्यांगता की मान्यता का दायरा काफी बढ़ाया गया।
इससे लाखों ऐसे लोगों को कानूनी पहचान मिली जो पहले व्यवस्था से बाहर थे।
3. समानता और भेदभाव निषेध
RPwD Act की धारा 3 स्पष्ट करती है कि दिव्यांगजन को समानता का अधिकार प्राप्त है और उनके साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा।
यदि किसी संस्था या विभाग की व्यवस्था के कारण दिव्यांग व्यक्ति समान अवसर से वंचित होता है, तो यह केवल प्रशासनिक समस्या नहीं बल्कि अधिकारों का प्रश्न बन सकता है।
4. Accessibility को कानूनी दायित्व बनाया
अब केवल रैंप बनाना पर्याप्त नहीं है।
सरकारी एवं सार्वजनिक उपयोग की अनेक सेवाओं, भवनों, परिवहन और सूचना प्रणालियों को दिव्यांग-अनुकूल बनाने की जिम्मेदारी तय की गई।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि दिव्यांगजन स्वतंत्र रूप से समाज के प्रत्येक क्षेत्र में भाग ले सकें।
5. शिक्षा और रोजगार
नए कानून ने समावेशी शिक्षा (Inclusive Education), उच्च शिक्षा में अवसर, सरकारी नौकरियों में आरक्षण तथा कार्यस्थल पर उचित सुविधा (Reasonable Accommodation) जैसे विषयों को अधिक मजबूत बनाया।
6. सरकार की जवाबदेही
RPwD Act केवल अधिकारों की सूची नहीं देता, बल्कि यह भी बताता है कि किस विषय के लिए Appropriate Government कौन होगी और कौन-सा विभाग जिम्मेदार होगा।
यही कारण है कि यह अधिनियम प्रशासनिक जवाबदेही का भी कानून है।
सोच में सबसे बड़ा परिवर्तन
1995 की सोच:
“दिव्यांग व्यक्ति समाज पर निर्भर है।”
2016 की सोच:
“समाज और शासन व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि दिव्यांग व्यक्ति समान रूप से जीवन जी सके।”
यही वास्तविक परिवर्तन है।
संविधान से संबंध
RPwD Act केवल एक सामान्य कानून नहीं है।
यह भारतीय संविधान के अनेक मूल सिद्धांतों को व्यवहार में लागू करने का प्रयास करता है—
- अनुच्छेद 14 — समानता का अधिकार।
- अनुच्छेद 15 — भेदभाव का निषेध।
- अनुच्छेद 21 — गरिमामय जीवन का अधिकार।
- अनुच्छेद 41 — राज्य का दायित्व कि वह दिव्यांग व्यक्तियों की सहायता करे।
- अनुच्छेद 46 — कमजोर वर्गों के हितों की रक्षा।
इस प्रकार RPwD Act संविधान की मूल भावना को दिव्यांगजनों के संदर्भ में व्यावहारिक रूप देता है।
क्या RPwD Act केवल पेंशन और आरक्षण का कानून है?
बिल्कुल नहीं।
यदि कोई व्यक्ति यह समझता है कि RPwD Act केवल—
- पेंशन,
- आरक्षण,
- ट्राइसाइकिल,
- छात्रवृत्ति
का कानून है, तो वह इसकी मूल भावना को नहीं समझता।
यह अधिनियम वास्तव में—
- समानता,
- गरिमा,
- स्वतंत्रता,
- सहभागिता,
- सुगम्यता,
- शिक्षा,
- रोजगार,
- न्याय तक पहुँच,
- और सरकारी जवाबदेही
का कानून है।
निष्कर्ष
RPwD Act, 2016 इसलिए नहीं लाया गया कि पुराने कानून का नाम बदल दिया जाए। इसे इसलिए बनाया गया क्योंकि भारत ने यह स्वीकार किया कि दिव्यांगजन किसी दया या कृपा के पात्र नहीं, बल्कि संविधान द्वारा संरक्षित समान अधिकारों वाले नागरिक हैं।
1995 का कानून कल्याण की दिशा में पहला कदम था, लेकिन 2016 का कानून अधिकारों की दिशा में एक व्यापक परिवर्तन है। इसने भारत की कानूनी सोच को “Welfare Model” से “Rights-Based Model” की ओर अग्रसर किया।
आज आवश्यकता केवल इस कानून के अस्तित्व की नहीं, बल्कि इसके प्रभावी क्रियान्वयन की है। जब तक सरकारी विभाग, स्थानीय निकाय, निजी संस्थान और समाज इसकी भावना को व्यवहार में नहीं उतारेंगे, तब तक RPwD Act का उद्देश्य पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं होगा।
दिव्यांगजन को सुविधा देना सरकार की उदारता नहीं, बल्कि कानून द्वारा निर्धारित दायित्व है। यही RPwD Act, 2016 का वास्तविक संदेश है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1. RPwD Act, 2016 क्या है?
उत्तर: RPwD Act, 2016 (Rights of Persons with Disabilities Act, 2016) भारत का प्रमुख कानून है, जिसका उद्देश्य दिव्यांगजनों को समान अधिकार, सम्मान, सुगम वातावरण, शिक्षा, रोजगार और न्याय तक समान पहुँच सुनिश्चित करना है।
प्रश्न 2. RPwD Act, 2016 क्यों बनाया गया?
उत्तर: 1995 के पुराने कानून की सीमाओं को दूर करने तथा संयुक्त राष्ट्र के UNCRPD के सिद्धांतों को लागू करने के लिए यह अधिनियम बनाया गया।
प्रश्न 3. क्या RPwD Act केवल पेंशन और आरक्षण का कानून है?
उत्तर: नहीं। यह केवल पेंशन या आरक्षण का कानून नहीं है। यह समानता, गरिमा, भेदभाव-निषेध, सुगम्यता, शिक्षा, रोजगार और सरकारी जवाबदेही का व्यापक अधिकार-आधारित कानून है।
प्रश्न 4. 1995 और 2016 के कानून में सबसे बड़ा अंतर क्या है?
उत्तर: 1995 का कानून मुख्यतः कल्याण (Welfare) पर आधारित था, जबकि 2016 का कानून अधिकार (Rights-Based Approach) पर आधारित है।
प्रश्न 5. UNCRPD क्या है?
उत्तर: UNCRPD (United Nations Convention on the Rights of Persons with Disabilities) संयुक्त राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय संधि है, जिसका उद्देश्य विश्वभर में दिव्यांगजनों के मानवाधिकारों की रक्षा करना है।
प्रश्न 6. भारत ने UNCRPD को कब स्वीकार किया?
उत्तर: भारत ने वर्ष 2007 में UNCRPD का अनुमोदन (Ratification) किया।
प्रश्न 7. RPwD Act में कितनी प्रकार की दिव्यांगताओं को मान्यता दी गई है?
उत्तर: वर्तमान में RPwD Act, 2016 के अंतर्गत 21 प्रकार की दिव्यांगताओं को मान्यता प्राप्त है।
प्रश्न 8. क्या RPwD Act निजी संस्थानों पर भी लागू होता है?
उत्तर: कई प्रावधान सरकारी और निजी दोनों संस्थानों पर लागू होते हैं, विशेषकर जहाँ सार्वजनिक सेवाएँ, शिक्षा, रोजगार या सार्वजनिक उपयोग की सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं। लागू होने की सीमा संबंधित प्रावधानों और नियमों पर निर्भर करती है।
प्रश्न 9. यदि किसी विभाग द्वारा RPwD Act का पालन नहीं किया जाए तो क्या किया जा सकता है?
उत्तर: संबंधित विभाग में शिकायत, राज्य आयुक्त/मुख्य आयुक्त (दिव्यांगजन अधिकार) के समक्ष शिकायत, तथा आवश्यकता पड़ने पर न्यायालय का सहारा लिया जा सकता है।
प्रश्न 10. क्या RPwD Act भारतीय संविधान से जुड़ा हुआ है?
उत्तर: हाँ। यह अधिनियम संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), 15 (भेदभाव निषेध), 21 (गरिमामय जीवन), 41 और 46 जैसे सिद्धांतों को व्यवहार में लागू करने का प्रयास करता है।
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